History Of Changej Khan And Mongol Empire | चंगेज़ खान और मंगोलों के बारे में ऐसी जानकारी कहीं नहीं मिलेगी

History Of Changej Khan And Mongol Empire  | चंगेज़ खान और मंगोलों के बारे में ऐसी जानकारी कहीं नहीं मिलेगी
History Of Changej Khan And Mongol Empire  | चंगेज़ खान और मंगोलों के बारे में ऐसी जानकारी कहीं नहीं मिलेगी



History Of Changej Khan And Mongol Empire  | चंगेज़ खान और मंगोलों के बारे में ऐसी जानकारी कहीं नहीं मिलेगी


१३ शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में पूर्व एशियाई महाद्वीप के महान साम्राज्य ने मध्य एशिया के मैदानी इलाकों में एक नई राजनीतिक शक्ति के उदय के एक बड़े खतरे को अनुभव किया, चंगेज खान ने मंगोलो को संगठित किया, पर चंगेज खान की राजनीतिक दूरदर्शिता मध्य एशिया के टीपी प्रदेश यानी घास के मैदानों में मंगोल जातियों का एक महासंघ मात्र बनाने से कहीं अधिक दूरगामी थे. उसका मानना था कि उसे ईश्वर से विश्व प्रशासन करने का आदेश प्राप्त था. हलाकि उसका अपना जीवन मंगोल जातियों पर कब्जा जमाने में और अपने साम्राज्य को विश्व के बहुत बड़े हिस्से में फैलाने में बीता। उसका साम्राज्य चीन, तुरान, अफगानिस्तान, पूर्व ईरान और रूस के मैदानी इलाकों तक फैला हुआ था. आगे चलकर उसके वन्सजो ने इस क्षेत्र से और आगे जाकर चंगेज खान के सपने को सार्थक किया। 


दुनिया के सबसे विशाल साम्राज्य का निर्माण किया और मंगोलों की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि, दरअसल मंगोल अलग-अलग समुदायों में से एक समूह था. ये लोग पूर्व में दातार, खेतान और मंजू लोगों से और पश्चिम में तुर्की कबीलो से भाषा का समानता होने के कारण एक दूसरे से जुड़े हुए थे. कुछ मंगोल पशुपालक थे और कुछ शिकारी संग्राहक थे. पशु पालक घोड़ों, भेड़ों और कुछ हद तक आन्य पशु जैसे बकरी और ऊंट को भी पालते थे. ओ जिन घास के मैदानों में खानाबदोश वाला जीवन बिता रहे थे, आज वह आधुनिक मंगोलिया का भूभाग है. इस क्षेत्र का परिदृस्य आज जैसा ही अत्यंत मनोरम था और यहां काशी तेज अत्यंत विस्तृत और घास के मैदानों से घिरा हुआ था. जिसके पश्चिमी भाग में अल्ताई पहाड़ों की बर्फीली चोटियां थे, दक्षिणी भाग में शुष्क गोबी का मरुस्थल, इसके उत्तर और पश्चिम क्षेत्र में ओनोन और शैलेंद् जैसी नदियां और बर्फीली पहाड़ियों से निकले सैकड़ों झरना के पानी से सिंचित हो रहा था.


पसु चराने के लिए यहां पर अनेक हरी भरी घास के मैदान और प्रचुर मात्रा में छोटे-मोटे शिकार, बदलते मौसम के हिसाब से मिल जाते थे. सीकरी संग्राहक लोग पशुपालक कबीलों के आवास क्षेत्र के उत्तर में साइबेरियाई बनो में रहते थे. वे पशुपालक लोगों की तुलना में अधिक गरीब होते थे. और गृष्म काल में पकड़े गए जानवरों की खाल के व्यापार से अपना जीवन यापन करते थे, इस पुरे इलाके में अधिकतम और न्यूनतम तापमान में बहुत अंतर पाया जाता था. कठोर और लंबे शीत मौसम के बाद अल्पकालीन और शुष्क गर्मियों की अवधी आती थी. चारण क्षेत्र में साल की सीमित अवधियों में ही कृषि करना संभव था. परंतु मंगोलों ने कृषि कार्य को नहीं अपनाया, नहीं पशुपालकों और ना ही शिकारी सन ग्राहकों की अर्थव्यवस्था। 


घनी आबादी वाले क्षेत्रों का भरण पोषण करने में समर्थ थी. परिणाम स्वरूप इन क्षेत्रों में कोई नगर नहीं उभर पाए. मंगोल तम्बू और जर्रो में निवास करते थे. और अपने पशुधन के साथ शीत कालीन निवास स्थान से ग्रीष्मकालीन चारण भूमि की ओर चले जाते थे. घास के मैदान इलाकों में संसाधनों की कमी के कारण मंगोलो और मध्य एशिया के खानाबदोशओं को व्यापार और वस्तु विनियम के लिए उनके पड़ोसी चीन के स्थाई निवासियों के पास जाना पड़ता था. व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी. खानाबदोश कबीले खेती से प्राप्त उत्पाद और लोहे के उपकरणों को चीन से लाते थे. और घोड़े, फर और स्टेपी में पकड़े गए शिकार का भी नियम करते।


उन्हें हिसाब किताब करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. क्योंकि दोनों पक्ष अधिक लाभ प्राप्त करने की होड़ में बेधड़क सैनिक कार्यवाही भी कर बैठते थे. दोनों पक्षों के बीच कई बार युद्ध भी हो जाते थे. जब मंगोल कबीलों के लोग साथ मिलकर व्यापार करते हैं तो वह अपने चीनी पड़ोसियों को व्यापार में बेहतर सरते रखने के लिए मजबूर करते थे. कभी कभी यह लोग व्यापारिक संबंधों को नकार कर केवल लूटपाट करने लगते थे. 


मंगोलो का जीवन अस्त-व्यस्त होने पर ही इन संबंधों में बदलाव आता था. ऐसी स्थिति में चीनी लोग अपने प्रभाव का  प्रयोग स्टेपी छेत्र में बड़ी आत्मविश्वास से करते थे. इन सीमावर्ती झड़पों से स्थाई समाज कमजोर पड़ने लगे. मंगोल खानाबदोशो ने कृषि को  अव्यवस्थित कर दिया। और नगरों को लूटा। दूसरी और खानाबदोश लूटपाट करने के बाद संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे. जिससे उन्हें बहुत कम हानि होती थी. अपनी संपूर्ण इतिहास में चीन को इन खानाबदोशओं से विभिन्न शासनकाल में बहुत अधिक क्षति पहुंचे। यहाँ तक की आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व से ही अपनी प्रजा की रक्षा के लिए चीनी शासकों ने किले बंदी करना प्रारंभ कर दिया था. 


3 शताब्दी ईसा पूर्व सेन किले बन्दुओं का एकीकरण सामान्य रक्षात्मक ढांचे के रूप में किया गया. जिसे आज चीन की महान दीवार के रूप में जाना जाता है. उत्तरी चीन के कृषक समाजों पर खानाबदोशो द्वारा लगातार हमलों और उनसे पनपते अस्थिरता और भय का एक जीता जागता सबूत है. 



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चंगेज खान का जीवन

चंगेज खान का जन्म 1162 ईस्वी के आसपास माना जाता है. चंगेज खान का जन्म आधुनिक मंगोलिया के उत्तरी भाग में ऊनोन नदी के निकट हुआ था. उसका प्रारंभिक नाम तेमुजीन था. उसके पिता का नाम येसूजेई था, जो कि याद कबीले का मुखिया था. परिवारों का समूह था. बोर्गीत कुल से संबंध था. उसके पिता की अल्पायु में ही हत्या कर दी गई थी. और उसकी माता ोलिनएक तेमुजीन और उसके सगे तथा सौतेले भाइयों का लालन-पालन बड़ी कठिनाईओ से किया। 


1170 के दशक में परिस्थितियां विपरीत थी. तेमुजीन का अपहरण कर उसे दास बना लिया गया और उसकी पत्नी बेटे का भी अपहरण कर लिया गया और अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए उसे लड़ाइयां लड़नी पडी. विपत्ति के इन वर्षों में भी ओ अनेक मित्र बनाने में कामयाब रहा. ओ घूरचूर नाम का नवयुवक उसका पहला मित्र था. और हमेशा एक विश्वस्त साथी के रूप में उसके साथ रहा. उसका सगा भाई जम्मू का भी उसका एक विश्वसनीय मित्र था. तेमुजिन ने तेराइज लोगों का साशक वे अपने पिता के वृद्ध सगे भाई तुगरिल उर्फ गुलफाम खान के साथ पुराने रिश्तो की पुनर्स्थापना की. हालांकि जम्मू का उसका पुराना मित्र था. लेकिन बाद में वो उसका शत्रु बन गया.


1180 और 1190 के दसकों में तेमुजिन ओम खान का मित्र रहा. और उसने इस मित्रता का इस्तेमाल जम्मूका जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों को परास्त करने में किया। जमुका को पराजित करने के बाद तेमुजीन में काफी आत्मविश्वास आ गया अन्य कबीलों के विरुद्ध युद्ध के लिए निकल पड़ा। इनमें से उसके पिता के हत्यारे शक्तिशाली तातार के राइट ऑन खान जिसके विरूद्ध उसने 1203 में युद्ध छेड़ा था. 


१२०६ में शक्तिशाली जम्मूका और निर्मल लोगों को निर्णायक रूप से पराजित करने के बाद, तेमुजिन स्टेपी क्षेत्र की राजनीति में सबसे प्रभावशाली ब्यक्ति के रूप में उभरा। उसकी इस प्रतिष्ठा को मंगोल कबीलों की सरदारों की एक सभा कुरील तआयी में मान्यता मिली. और उसे चंगेज खां यह सार्वभौमिक शासक की उपाधि के साथ मनोगोलो का महानायक चंगेज खान घोषित किया गया


1206 में कुड़ी लता इसे मान्यता मिलने से पहले चंगेज खान ने मंगोलों को एक सशक्त और अनुशासित सैन्य सकती के रूप में पुनर्गठित किया था. जिससे उसके भविष्य में किए गए सैन्य अभियान की सफलता एक प्रकार से तय हो गई. उसकी पहली मनसा चिन पर विजय प्राप्त करने की थी. जो उस समय 3 राज्यों में बटा हुआ था. यह ३ राज्य थे उत्तर पश्चिमी प्रांतों के तिब्बती मूल के सीसिया लोग, जार्चिन लोगों के चीन राजवंश जो पैकिंग से उत्तरी चीन क्षेत्र का शासन चला रहे थे. शुंग राजवंश जिनके आधिपत्य में दक्षिणी चीन था. 


1209 में सीसिया लोग परास्त हो गए. 1213 में चीन की महान दीवार का भी अतिक्रमण हो गया. 1215 में पैकिंग नगर को लूटा गया. भविस्य में चंगेज खां के बाद भी जिन वंश के विरुद्ध 1234 तक लंबी लड़ाइयां चली, पर उस समय चंगेज खां अपने अभियानों की स्थिति से संतुष्ट था. इसलिए उस क्षेत्र के सैनिक मामले अपने अधीनस्थों की देखरेख में छोड़कर वह 1216 में मंगोलिया स्थित अपनी मातृभूमि की ओर लौट गया. 1218 में करा गीता की पराजय के बाद जो चीन के उत्तरी पश्चिमी भाग में स्थित पिए इंसान की पहरिओ को नियंत्रित करती थी मंगोलो का साम्राज्य अमुदरिया, चरण और क्वाडंग राज्यों तक विस्तृत हो गया. क्वाडंग का शासक सुल्तान मोहम्मद चंगेज खान के प्रचंड कोप का भाजन बना. जब उसने मंगोल दूतों का वध किया। 


1219 और 1221 तक के अभियानों में बड़ी नगरो ोॉर्टर, भुखरा, समरकंद,बल्ख, गुरगंज, मरब निशापुर और हेरात में मंगोल सेनाओं के सम्मुख समर्पण कर दिया। जिन नगरों ने प्रतिरोध किया उनका विध्वंस कर दिया गया. निशनपुर में घेरा डालने के दौरान जब एक मंगोल राजकुमार की हत्या कर दी गई, तो चंगेज खान ने आदेश दिया कि नगर को इस तरह विध्वंस किया जाए कि संपूर्ण नगर में हल चलाया जा सके. अपने प्रतिशोध को उग्र रूप देने के लिए ऐसा संघार किया जाए कि नगर के समस्त बिल्ली और कुत्तों को भी जीवित न रहने दिया जाये। मंगोल सेनाएं सुल्तान मोहम्मद का पीछा करते हुए अजरबैजान तक चली आई, और क्रीमिया में रूसी सेनाओं को हराने के साथ-साथ उन्होने कैस्पियन सागर को भी घेर लिया। सेना की दूसरी टुकड़ी सुल्तान के पुत्र जलालुद्दीन का अफगानिस्तान और सिंध प्रदेश तक पीछा किया। सिंधु नदी के तट पर चंगेज खान ने उत्तरी भारत और असम से मंगोलिया वापस लौटने का विचार किया। परन्तु असहनीय कर्मी प्राकिर्तिक आवास की घटनाएं तथा उसके सलाहकारों द्वारा दिया गया अशुभ संकेतों के आभास ने अपने विचारों को बदलने के लिए बाध्य कर दिया। अपने जीवन का अधिकांश भाग युद्ध में व्यतीत करने के बाद. 1227 में चंगेज खां की मृत्यु हो गई. उसकी सैनिक उपलब्धियां विस्मित कर देने वाली थी. ये बहुत हद तक स्टेपी क्षेत्र की युद्ध शैली के बहुत से आयामों को आवश्यकता अनुसार परिवर्तित और सुहार करके उसको प्रभावशाली रणनीति में बदल पाने का परिणाम था. 


मंगोलों और तुर्कों के घुड़सवारी कौशल ने उसकी सेना को गति प्रदान की थी. घोड़े पर सवार होकर उनकी तीरंदाजी का कौशल अद्भुत था. जिसे उन्होंने अपने दैनिक जीवन में जंगलों में पशुओं का शिकार करते समय प्राप्त किया था. उनके उस घुड़सवारी तीरंदाजी के अनुभव ने उनकी सैनिक गति को बहुत तेज कर दिया। स्टेपी प्रदेश के घुड़सवार सदैव फुर्तीली और बड़ी तेज गति से यात्रा करते थे.


अब उन्हें अपने आसपास के भूभाग और मौसम की जानकारी हो गई. जिसने उन्हें अकलपिया कार्य करने की क्षमता प्रदान की. उन्होंने भयानक ठंड में भी युद्ध अभियान प्रारंभ किए, तथा उनके के नगरों और शिविरों में प्रवेश करने के लिए बर्फ से जमी हुई नदियों का राजमार्गो की तरह प्रयोग किया। खानाबदोश लोग अपनी परंपराओं के अनुसार प्राचीरो के आरक्षित शिविरों में पेंट बनाने में सक्षम नहीं थे. पर चंगेज खान ने घेराबंदी और नेता बमबारी के महत्व को शीघ्र जाना। उसकी कुशल इंजीनियरों ने उसकी शत्रुओं के खिलाफ अभियानों में इस्तेमाल करने के लिए लाइट पोर्टेबल इक्विपमेंट का भी इस्तेमाल किया। जिससे युद्ध में घातक प्रभाव होते थे.



चंगेज खां के बाद मंगोल.  

चंगेज खान की मृत्यु के बाद हम मंगोल साम्राज्य को दो चरणों में विभाजित कर सकते हैं पहला चरण 1236 से 1242 तक था, जिसके दौरान रूस के स्तेपी छेत्र बुलघ्हार, किव, पोलैंड तथा हंगरी में भरी सफलता प्राप्त की गई. 

दूसरे चरण 1255 से 1300 तक रहा, जिसमें समस्त चीन ईरान इराक और सीरिया पर विजय प्राप्त की गई. इन अभियानों के पश्चात साम्राज्य की पारी सीमाओं में इस्थिरता आई. 


सन 1203 के बाद के दशकों में मंगोल सेनाओं को बहुत कम कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। परन्तु ये ध्यान देने योग्य बात है, कि शन 1260 के दशक के बाद पश्चिम के सैन्य अभियानों के शुरुआती आवे को जारी रखना संभव नहीं हो पाया। हलाकि विएना उससे परे पश्चिमी यूरोप एवं मिश्र मंगोल सेनाओं के अधिकार में ही रहे. इसी लिए उनके हंगरी के स्टेपी छेत्र से हट जाने और मिश्र की सेनाओं द्वारा पराजित हो जाने से नवीन राजनीतिक प्रवृत्तियों के उदय होने के संकेत मिले। इस प्रवृत्ति के दो पहलू थे. 


पहला मंगोल परिवार में उत्तराधिकार को लेकर आंतरिक राजनीति थे. प्रथम 2 पीढ़ियां जयोचि और ऊगो देवी के उत्तराधिकारी महँान  खान के राज्य पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए एकजुट हो गए. अब उनके लिए यूरोप में अभियान करने की अपेक्षा अपने इन हितों की रक्षा करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया. 


दूसरी स्थिति तब उत्पन्न हुई जब चंगेज खान के वंश की तो लोग शाखा के उत्तराधिकारी ने जयोचि और ऊगो देवी वंशो को कमजोर कर दिया। मोंगके जो चंगेज खान के सबसे छोटे पुत्र तोलोई का वंशज था, उसके राज्य अभिषेक के बाद 1250 ईस्वी के दशक में ईरान में शक्तिशाली अभियान किया गए. परंतु 1260 ईस्वी के दशक में तोलुइ के वंशजों ने चीन अपनों की हितो की वृद्धि की, तो उसी समय सैनिक और रसद सामग्रीओ को मंगोल साम्राज्य के मुख्य भागों की ओर भेज दिया गया. इसके परिणाम स्वरूप मिस्र की सेना का सामना करने के लिए मंगोलो ने एक छोटी अपर्याप्त भेजी। 


मंगोलों की पराजय और तोलुइ के परिवार से चीन के प्रति निरंतर बढ़ती हुई रूचि से उनका पश्चिम की ओर विस्तार रुक गया. इसी दौरान रूस और चीन की सीमा पर जोचि और तोलोई बंशो के अंदरूनी झगड़ों ने जो जोचि वंशजो का ध्यान उनके संभावित यूरोपीय अभियानों से हटा दिया। पश्चिम में मंगोलो का विस्तार रुक जाने से चीन में उनके अभियान शिथिल नहीं हुए वस्तुतह उन्होंने चीन को एकीकृत किया।



सामाजिक राजनीतिक और सैनिक संगठन 

मंगोलो और अन्य अनेक खानाबदोश समाजों में प्रत्येक तंदुरुस्त सदस्य हथियार बंद होते थे, जब कभी आवश्यकता होती थी तो इन्हीं लोगों को मिलाकर एक सेना बनाई जाती थी. विभिन्न मंगोल जनजातियों के एकीकरण और उसके पश्चात विभिन्न लोगों के खिलाफ अभियान  से, चंगेज खां की सेना में नए सदस्य शामिल हुए. इससे उनकी सेना जो कि अपेक्षाकृत रूप से छोटी और अभीभेज समुँह थे.  विश्वसनीय रूप से एक विशाल विषम जातीय संगठन में परिवर्तित हो गई. इसमें उनकी सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार करने वाले तुर्की मूल के वेग समुदाय के लोग शामिल थे. 


केराइओटो जैसे पराजित लोग भी इसमें सम्मिलित थे. जिन्हें अपनी पुरानी शत्रुता के बावजूद महाशंघ में शामिल कर लिया गया. चंगेज खान ने संकल्प किया था, कि वह उन विभिन्न जनजातीय समूहों को मिटा देगा, जो उसके महासंघ के सदस्य थे. उसकी सेना स्टेपी क्षेत्रों की पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार, गठित की गई थी. 


जो 10, 100, 1000 और 10000 सैनिकों की इकाई में विभाजित थी. पुरानी पद्धति में कुल कबीले और सैनिक एक साथ में थे. चंगेज खान ने इस प्रथा को समाप्त किया। उसने प्राचीन जनजातीय समूह को विभाजित कर, उसके सदस्यों को नवीन सैनिक इकाइयों में विभक्त कर दिया। उस व्यक्ति को जो अपने अधिकार की अनुमति लिए बिना बाहर जाने की चेष्टा करता था, उसे कठोर दंड दिया जाता था. सैनिकों की सबसे बड़ी इकाई लगभग 10000 सैनिकों के थे, जिसे तुबंध कहा जाता था. 


इसमें अनेक कबीलों और कूलो के लोग शामिल होते थे. उसने स्टेपी क्षेत्र की पुरानी सामाजिक व्यवस्था को परिवर्तित किया। और विविन्न वंशो तथा कुलों को एकीकृत कर, इसके जनक चंगेज खान ने इन सभी को एक नवीन पहचान प्रदान की. नई सैनिक टुकड़ी जो उसके चार पुत्रों के अधीन थी, और विशेष रूप से चयनित कप्तानों के अधीन कार्य करते थे, उन्हें नोयान कहा जाता था. इस नई व्यवस्था में उसके अनुयायियों का वह समूह शामिल था, जिन्होंने ने बड़ी ही निष्ठा से कई वर्ष घोर प्रतिकूल अवस्था में भी, चंगेज खान का साथ दिया था. चंगेज खान ने सार्वजनिक रूप से ऐसे अनेक व्यक्तियों को अंडा यानी सगा भाई कहकर सम्मानित किया। 


जो ये दर्शाता था, कि चंगेज खान के संबंध अपने नौकरों के साथ भी बहुत गहरे थे. इस तरह से नए वर्गीकरण ने पूर्व से चले आ रहे हैं सरदारों के अधिकारों को, सुरक्षित नहीं रहा. जबकि नए तरह से उभरे अभी जाति वर्ग ने, अपनी प्रतिष्ठा मंगोलों के महानायक के साथ, अपनी करीबी रिश्ते से प्राप्त की. इस नई हरारकी में चंगेज खान ने अपने नवजित लोगों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चार पुत्रों को सौंप दिया। इससे उलुस का गठन हुआ. चंगेज खान का जीवनकाल अभी भी निरंतर अधिक से अधिक  साम्राज्य बढ़ने का अधिरुक्त था.  


और जिसकी सीमाएं अत्यंत परिवर्तनशील थी. उसके सबसे बड़े बेटे जोचि को रूसी स्टेपी प्रदेश प्राप्त हुआ. परन्तु उसकी दूरस्थ सीमा, यानी उलुस निर्धारित नहीं थे. इसका विस्तार सुदूर पश्चिम तक विस्तृत था. जहाँ तक उसके घोड़े स्वेच्छा पूर्वक भ्रमण कर सकते थे. उसके दूसरे बेटे चगताई को चरण का स्थिति क्षेत्र तथा पहाड़ का उत्तरी क्षेत्र भी मिला. जो उसके भाई के प्रदेश में लगा हुआ था. 


संभवतः जैसे-जैसे पश्चिम की ओर बढ़ता गया होगा, वैसे वैसे ये अधिकार क्षेत्र भी परिवर्तित होता गया होगा। चंगेज खान ने संकेत दिया था कि उसका तीसरा पुत्र ोगोदेई उसका उत्तराधिकारी होगा। और उसे महान खान की उपाधि दी जाएगी। इस राजकुमार ने अपने राज्य अभिषेक के बाद अपनी राजधानी, कराकोरम में प्रतिष्ठित की. उसके सबसे छोटे पुत्र तोलोई  ने, अपनी पैतृक भूमि मंगोलिया को प्राप्त किया. 


चंगेज खान का यह विचार था कि उसके पुत्र परस्पर मिलजुल कर साम्राज्य का शासन करेंगे। और उसे ध्यान में रखते हुए उसने विभिन्न राजकुमारों के लिए, अलग-अलग सैनी टुकड़िया निर्धारित कर दी. इन सैन्य टुकड़ियों को तमा कहा जाता था. जो प्रत्येक उलुस में तैनात रहते थे. परिवार के सदस्यों में राज्य की भागीदारी का बोध सरकारों की परिषद यानि किरिलताई में होता था. जिसमें परिवार या राज्य के भविष्य के निर्णय अभियान हो लूट का माल का बंटवारा, चरागाह भूमि और उत्तराधिकार आदि के समस्त निर्णय, सामाजिक रूप से लिए जाते थे. 


चंगेज खान ने पहले से ही एक फुरतीली हर तारा पद्धति अपना रखे थे. जिससे राज्य के दूरदराज के स्थानों में परस्पर संपर्क रखा जा सके. अपेक्षित दूरी पर निर्मित सैनिक चौकियों में स्वस्थ एवं बलवाण घोड़े तथा घुड़सवार संदेशवाहक तैनात रहते थे. इस संचार पद्धति की व्यवस्था करने के लिए, मंगोलिया यावर अपने पशु समूहों से अपने घोड़े अन्य पशुओं का दसवां हिस्सा प्राप्त करते थे. इसे कुड़कुड़ कहा जाता था. 


इस उगाही को यायावर लोग अपनी स्वेच्छा से प्रदान करते थे. जिससे उन्हें अनेक लाभ प्राप्त होते थे. चंगेज खान की मृत्यु के बाद इस हर कार्य पद्धति में और भी सुधार लाया गया. इस पद्धति की गति तथा विश्वसनीयता यात्रियों को आश्चर्य में डाल देती थी. इससे महान खानों को अपने विस्तृत महाद्वीपीय साम्राज्य के, सुदूर स्थानों में होने वाली घटनाओं की निगरानी करने में भी सहायता मिलती थी. 


१३र्वी सटप्पधहि के पूर्वार्ध में युधो में अनेक नगर नष्ट कर दिए गए. कृषि भूमि को हानि हुई.  व्यापार चौपट हो गया, तथा दस्तकारी वस्तुओं के उत्पादन व्यवस्था व्यस्त हो गई. सैकड़ों हजारों लोग मारे गए. और इससे कहीं अधिक दास बना लिए गए. इनकी वाक्य अतिशयोक्ति पूर्ण तथ्यों के जाल में खो गई है. जब मंगोलों के सैन्य अभियानों में विराम लगा तब यूरोप और चीन के भूभाग आपस में जुड़ गए. 


मंगोल विजय के बाद शांति का माहौल बन गया और व्यापारिक संबंध मजबूत हुए. मंगोलों की देखरेख में रेशम मार्ग यानी सिल्क रूट पर व्यापार और भ्रमण अपने शिखर पर पहुंचा. लेकिन पहले की तरह व्यापारिक मार्ग चीन में ही खत्म नहीं होते थे, वे उत्तर की ओर मंगोलिया तथा नविन साम्राज्य के केंद्र कराकोरम की ओर बढ़ गए. मंगोल शासन में समंजश स्थापित करने का संचार और यात्रियों के लिए सुलभ यात्रा आवश्यक थी. सुरक्षित यात्रा के लिए यात्रियों को पास जैसे फारसी में पैसा और मंगोल भाषा में जेरेज कहा जाता है जारी किए जाते थे. 


इस सुविधा के लिए व्यापारी बाज नामक कर अदा करते थे. जिसका अर्थ यह था की वे मंगोल शासक की सत्ता स्वीकार करते हैं. १३वी शताब्दी ईस्वी में मंगोल साम्राज्य में खानाबदोश और स्थानबद्ध समुदायों में विरोध कम होते गए. उदाहरण के लिए 1230  के दशक में जब मंगोलों ने उत्तरी चीन के चीन वंश के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की. तो मंगोल नेताओं के क्रुद्ध वर्क ने दबाव डालकर ये विचार रखा की समस्त किसानों को मौत के घाट उतार दिया जाए. और उनकी कृषि भूमि को चरागाह में परिवर्तित कर दिया जाए. 


परंतु 1270 के दशक के आते-आते शंभू वंश की पराजय के बाद दक्षिणी चीन को मंगोल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया. तब चंगेज का पोता को कुबलाइ खान कृषक और नगरों के रक्षक के रूप में उभरा। गजन खान जो चंगेज खान के सबसे छोटे पुत्र तोलोई का वंशज था, उसने अपने परिवार के सदस्यों अपने सेनापतियों को आगाह कर दिया था कि वह कृषको को ना लूटे। एक बार अपने भाषण के दौरान उसने कहा था. कि ऐसा करने से राज्य में स्थायित्व और समृद्धि नहीं आएगी। उसका इस तरह से किसानों के पक्ष में आवाज उठाना चंगेज खान को भी हैरान कर देता था.


आगे चलकर १३र्वी शताब्दी के मध्य तक भइओ के बीच पिता द्वारा अर्जित धन को मिल बैठकर इस्तेमाल करने की बजाय व्यक्तिगत राज्यवंश बनाने की भावना ने स्थान ले लिया। और एक अपने ूलोस यानी अपने व्यक्तिगत अधिकृत क्षेत्र का स्वामी हो गया. जाहिर है कि उत्तराधिकार के लिए संघर्ष का परिणाम था. जिसमे चंगेज खान के वन्सजो के बिच महान पद के लिए तथा उत्कृष्ट चारागाह भूमि पाने के लिए होड होती थी. चीन और ईरान दोनों पर शासन करने के लिए आए तोलोई के वंशजों ने युवान और इलख़ान वंशों की स्थापना की. जोचि ने सुनहरा गिरओह  यानी गोल्डन हार्ट का गठन किया। और रूस के स्टेपी क्षेत्रों पर राज किया। 


जगताई के उत्तराधिकारी ने चरण के स्टेपी  छेत्रों पर राज किया। जिसे आज कल तुर्किस्तान कहा जाता है. यह बात ध्यान देने योग्य है कि मध्य एशिया जहाँ पर जागते के वंशजों का राज था, तथा रूस के स्थिति निवासियों में खानाबदोश परंपराएं सबसे अधिक समय तक चले, उस समय रूस को गोल्डन होर्डे के नाम से जाना जाता था. चंगेज खा के वंशजों का धीरे-धीरे अलग होकर समूह में बढ़ जाने का तात्पर्य था. उनका अपने पिछले परिवार से जुड़ी समीरीतिओ और परंपराओं के सामंजस्य में बदलाव आना साफ तौर पर यह सब एक कुल के सदस्यों में परस्पर प्रतिस्पर्धा के परिणाम स्वरूप हुआ.  


और इसी की एक शाखा टोली इतने अपने पारिवारिक मतभेद आंत बड़ी निपुणता से अपने संरक्षण में प्रस्तुत किए जा रहे इतिहास में दिया। बहुत हद तक यह सब चीन और ईरान के नियंत्रण का और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा बहुत बड़ी संख्या में विद्वानों को अपने यहां भर्ती करने का परिणाम था. परिष्कृत रूप से कहा जा सकता है कि अतीत से अलग होने का मतलब पिछले शासकों की अपेक्षा प्रचलित शासकों के गुणों को अधिक लोकप्रिय करना था. चंगेज खान के वंशजों को विरासत में जो कुछ भी मिला वो महत्वपूर्ण था. 


लेकिन उनके सामने एक समस्या थी, एक स्थान बाद समाज में अपनी एक धाक जमाने की थी. इस बदले हुए समय में वे वीरता की वो तसवीर पेश नहीं कर सकते थे. जैसे चंगेज खान ने की थी. १३र्वी शताब्दी के मध्य तक मंगोल एक एकीकृत जन संमुह  के रूप में उभर कर सामने आए और उन्होंने एक ऐसे विशाल साम्राज्य का निर्माण किया जिसे दुनिया में पहले कभी नहीं देखा गया था. उन्होंने अत्यंत जटिल शहरी समाजो पर शासन किया। जिनके अपने अपने इतिहास नियम थे. हालांकि मंगोलों का अपने साम्राज्य के क्षेत्रों पर राजनीतिक प्रभुत्व रहा. फिर भी संख्यात्मक रूप सेवे अलप संख्या में थे. 



चंगेज खान और मंगोलों का विश्व इतिहास में स्थान 

आज जब हम चंगेज खां को याद करते हैं तो हमारी कल्पना में ऐसी तस्वीरें आती है जैसे कि एक विजेता नगरों को ध्वस्त करने वाला और एक ऐसे व्यक्ति की छवि जो हजारों लोगों की मृत्यु का उत्तरदाई है तेरहवीं शताब्दी के चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप के नगर वासी स्टेपी के गिरोह को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे. फिर भी मंगोलो के लिए चंगेज खान अब तक महान शासक था. उसने मंगोलों को संगठित किया। लम्बे समय से चली आ रही कबीलाई लड़ाई और चीनियों द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्ति दिलाई। साथ ही उन्हें समृद्ध बनाया। 


एक शानदार पार महाद्वीपीय साम्राज्य बनाया और व्यापार के रास्तों और बाजारों को पुनर्स्थापित किया। जिनसे वेनिश के मार्कोपोलो की तरह दूर के कई यात्री आकर्षित हुए. चंगेज खान के परस्पर विरोधी चित्रों का कारण एकमात्र परिप्रेक्ष्य भिन्नता नहीं। बल्कि ये विचार हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि किस तरह से एक प्रभावशाली दृष्टिकोण अन्य को पूरी तरह से मिटा देता है. मंगोल शासकों ने सब जातियों और धर्मों के लोगों को अपने यहां प्रशासकों और हथियारबंद सैन्य दल के रूप में भर्ती किया। इनका शासन बहू जाती, बहु भासी और बहु धार्मिक था. 


जिसको अपने बहुविध संविधान का कोई भय नहीं था. उस समय के लिए एक असामान्य बात थी. इतिहाश्कार अब उन विधियों को अध्ययन करने में लगे हैं. जिनके माध्यम से मंगोल अपने बाद में आने वाली शासन प्रणालियों के अनुसरण के लिए आदर्श प्रस्तुत कर सके. १४वी शताब्दी के अंत में एक अन्य शासक तैमूर जो एक विश्वव्यापी राज्य की आकांक्षा रखता था. उसने अपने राजा को घोषित करने में संकोच का अनुभव किया, क्यूंकि वह चंगेज खान का वंसज नहीं था. जब उसने अपनी स्वतंत्र संप्रभुता की घोषणा की, तो अपने को चंगेज खान के दामाद में रूप में प्रस्तुत किया। आज दसकों के रुसी नियंत्रण के बाद मंगोलिया एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है. उसने चंगेज खान को एक महान राष्ट्र नायक के रूप में लिया है जिसका सार्वजनिक रूप से सम्मान किया जाता है. और जिस की उपलब्धियों का वर्णन वहां पर बड़े ही गर्व के साथ किया जाता है.


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